Friday, 19 June 2015

कब समझोगे

कब समझोगे
मेरे प्रियतम
तुम मन की
मेरे अभिलाषा
कब नयनो की
मेरे दिल की
तुम समझोगे
जब भाषा।
क्यों रूठ गए
जो टूट गई
प्रिय वंदन
की परिभाषा।
नित चाह नहीं
कोई राह नहीं
मन को संताप ज़रा सा।
जब एक मिलन हो
जी लें तब 
उस छण को
पूर्ण धरा सा।  

बारिश और मै

कैसे गिरती हुई उन बूंदों से
मै खिल खिल जाती हू
जैसे तुम्हारे आगोश में
प्यार से सिमट सी जाती हू।

छप छप गिरता पानी
हथेलियों पर दरिया बनाता है
और  दिल उस समंदर मे
प्यार की कश्ती चलाता है।

मेरी मुस्कान से जैसे
तुम्हारा तन बदन खिल जाता है
तुम कितने मेरे अपने हो
मौसम ये अहसास कराता है।

बादल के टुकड़े सा नन्हा ये मन
प्यार के आसमां में घूमकर आता है
गुनगुनी सी धूप में
दिल का जर्रा जर्रा भर जाता है। 

आशा

नित नया सृजन
नित नया गगन
आओ हम कुछ कर जाएँ
इस जीवन की फुलबगिया में
हम पुष्प ही पुष्प खिलाएं।

पीछे छोड़ो उन अश्रु को
जो ला दें आँख अँधेरा
जल की बूंदों को स्वेद बना
लिख दो इक नया सवेरा।

जागे मन में जो अभिलाषा
उसे दो उमंग की भाषा
तुम पूर्ण करो कर्मठता से
नव पल्लव की तब आशा।