सोमवार, 20 अप्रैल 2020

तुम आना

ह्रदय में बसाये अमित प्यार
नव स्वप्नों का संसार संजोये
बस कर प्राणो में अनायास
मुझ में कलियों सी मुस्काना

अद्भुत रोमांच लिए तन में
निज खुशियों के उस क्रंदन में
हँस देना किंचित देख मुझे
नैनो से आंसू बरसाना

हिय की अभिलाषा मुखर कर
नैनों का जाल फैला जाना
मेरे मन  व्याकुल व्योम में
तुम धवल चांदनी बरसाना

दुःख में सुख की ले नवल किरण
सुख में भी दुःख का महाभरण
हर इक रुदन में हास लिए
तुम मेरे जीवन में आना

नहीं मिलते



जाने कहाँ खो गए
...मुझमे सिमटकर
मेरे अहसास कर दे बयां
....वो लफ्ज़ नहीं मिलते।

भर देती थी जिनसे
.. किताबो के पन्ने
ज़िन्दगी में उलझे
.....वो हर्फ़ नहीं मिलते।

बेशकीमती थी जिनके लिए
...मुस्कान अधरों की
आते उनके इस ओर अब
....कदम नहीं दिखते।

आंसू का समंदर
...जो भरा रहता था
उनसे गिरते अब
...अश्क नहीं दिखते।

हो गई....ज़िन्दगी सहरा सी
..नहीं आबशार कोई
कि इस रेगिस्तान में ख़ुशी के
...फूल नहीं बिकते।

मेरे चेहरे की रौनक
.. ये किसी और का नूर है
अधूरे से हैं कुछ हम .........
...अब मुकम्मल नही  मिलते ।













पंच तत्व

पञ्च तत्त्व 


क्षिति जल पावक गगन समीरा
पञ्च तत्त्व यह रचित शरीरा
 जन्म मिला मानुष जीवन का
जनम जनम क्यों रहे अधीरा

पांच तत्त्व जीवन आधार
आधारित कविता की धार
व्यक्त करू मैं समक्ष सबके
अपनी चाँद पंक्तिया प्रसार

अपनी चाँद पंक्तिया प्रसार
नहीं अतिश्योक्ति अत्याचार
हस्तप्रहर किया सृष्टि पर
रोये क्षिति अविरल धारों धार

अनुपम सृजन कृत्या वसुधा का
 हरित रूप है वसुंधरा का
मौलिकता अभिव्यक्त कणो में
अद्भुत दृश्य रत्न गर्भा का

फिर क्यों धर, स्वांग है आया
धरा का जिसने किया सफाया
नैसर्गिक अनुपम अरण्य का
रूप तनिक क्या इसे न भाया ?

दूजा तत्व, तो है जल पावन
मेघ घिरे ,घटा लाये सावन
तरु पादप की उपस्थिति से
गिरी का ह्रदय हुआ मनभावन

वर्षा आई उमंगित कोपल
तब तक जब तक वन है रक्षित
जीवन सलिल, सलिल जीवन है
नीर सदैव करो परिरक्षित

तीजा तत्व अग्नि की ज्वाला
क्षण भंगुर जीवन का प्याला
क्यों फिर क्लेश धरे चिंतन में
द्वेष दहन कर.... हो मतवाला

राख बने कलुषित अवशेष
हिंसा कपट , राग और द्वेष
स्वाहा करे मानव सब मिलकर
 प्रेम का हो ..... निर्मल समवेश

चौथ तत्व दिग दिगन्त है
नील व्योम वसुधा प्रेमी
छत्र बना  मानव जीवन का
साधे जो है रवि की गर्मी

क्यों न हम प्रयास करे अब
ताप प्रचण्ड ना होय सके
गतिशील रहे, गतिमान रहे
जीवन प्रवाह विद्यमान रहे

पंचम तत्व मलय समीर है
प्रकृति जब रूप अनूप धरे
तीव्र वेग संक्षोभ बने यह
वन जो प्रदूषण कंस हरे

ठहरा पथिक ज्यों शाखहीन तरु
नीचे तनिक विश्राम करे
विस्मित क्यों मानव अब जब
अवलोकित पात हों ....जरे जरे

एक प्रश्न,
अनुत्तरित यहांपर
त्वरित निदान
की मांग करे ---
ईश सृजन जब मुरझाएगा
     पुष्प नहीं होंगे डालों पे
         तिमिर घना जब छा जाएगा
             क्या खग मृग जीवन बच पाएगा ?



हरियाली

सृजन कृत्य है वसुधा का
हरित रुप है धरा का
मौलिकता अभिव्यक्त कण कण में
अद्भुत प्राकट्य वसुंधरा का.

आज मनोहर रुप धरा, धरा ने
इन्द्रधनुषी रंगों को समस्त लगे सराहने
जल की बूंदें बरसेंगी घटा से
आये मेघ संग दामिनी प्रेम जताने.

मधुर राग से कूजे कोयल काली
तृप्त हुयी फूलों की डाली डाली
दिवस हुआ कब, रात भयी कब
हृदय उमंगित, भूली इक मतवाली.