रविवार, 9 जनवरी 2022

कुछबातें‌अधूरी सी

 *कुछ बातें अधूरी सी*

रह जाती है सीने में धड़कन बनकर

 जो कही नहीं जाती ...कुछ बातें अधूरी सी 

जुबां पर आते-आते हलक में ही रुक जाती हैं 

जो बयां नहीं होती ... कुछ बातें अधूरी सी 

तुम्हें देख कर मुस्कुरा दें, या खोने की याद में रो दे 

वो समझ नहीं आतीं ... कुछ बातें अधूरी सी 

यकीनन खुदा ने खेला था मजाक कि सफर साथ मुकम्मल ना हुआ 

जो मंजिल तक करनी थी ना कर पाए ...कुछ बातें अधूरी सी 

वो जो पानी में पत्थर फेंक कर बनाते थे तरंगे 

पानी से गुस्ताखियां, बद्दुआओं में दे गई ....कुछ बातें अधूरी सी 

जमाने की नजरों में हासिल थे तुम मुझे और मैं तुम्हें 

पर कहीं शायद हम दोनों के बीच रह गई ....कुछ बातें अधूरी सी 

कुछ बातें अधूरी सी 

कुछ बातें अधूरी सी....

राधिका भंडारी

हिंदी मेरी शान

 हिंदी मेरी शान


भावनाओं की अभिव्यक्ति को प्रस्तुत करती आई हैं मेरी कविताएं और मेरे लेख। वार्तालाप  का पहला पुष्प पल्लवित ही हिंदी के साथ हुआ क्योंकि यह मेरी मातृभाषा है। मेरे जीवन के अनेकों क्षण  जिसमें उतार-चढ़ाव, सुख-दुख इत्यादि शामिल थे सभी प्रत्यक्षतः पन्नों पर हिंदी द्वारा ही अवतरित हुए।

मां के आंचल जैसी छांव देती है मुझको हिंदी। मेरे अश्रुओं की धारा को भी कविता बनाती है हिंदी, तो कभी मेरी खिलखिलाहट के रंग उकेरता लेख। 

 हिंदी हिंद की भाषा है और मैं गौरव महसूस करती हूं इस भाव प्रकट करने का अवसर देने वाली मेरी मातृभाषा पर। कलम चलता है मेरा निर्विरोध समस्त अक्षरों व व्यंजनों को लेकर और जैसे मेरा राष्ट्र सर्व धर्म समभाव की भावना से ओतप्रोत तेजस्वी है उसी प्रकार हिंदी भी अनेकों समन्वय स्वयं में लेकर गरिमामय है। 

मेरे विचारों का कार्यस्थल मेरी मातृभाषा से ही सशक्त हुआ और हिंदी ने मुझे दी एक पहचान।

 जीवन के अनेक पक्षो मे 

 एक होता है भावों की अभिव्यक्ति

 मातृभाषा ही देती है 

उन्हें व्यक्त करने की शक्ति 

जब रोता है नन्हा बालक 

मातृभाषा में ही बिलखता है 

उसके टूटे शब्दों में भी 

प्रेम अपनी भाषा का छलकता है 

राधिका भंडारी

कान्हा तो हैं मोहने

 कान्हा तो है मोहने


कान्हा तो है मोहने

 नटखट से गिरधारी 

मुरली वाले की तानों पर 

दुनिया है बलिहारी 

मेरे गिरधर की बंसी पर 

मैं तो हूं दिल हारी 

राधा, रुकमणी, मीरा भी 

कान्हा पर वारी वारी 

 चक्र चलाएं रास रचाए 

मोहन इच्छाधारी 

हाथ जोड़कर नमन करें 

उनको सारे नर नारी

मीरा जी के विश्व की प्याली 

अमृत है कर डारी 

चीर हरण की शक्ति से भी

 तेरी महिमा भारी 

माखन खायो मिसरी खायो 

ऊंची रहे अटारी 

मैया ने जब डांट लगायो 

भर गई अखियां कारी 

ऐसे मेरे मोहन हैं, है चंचल मदन मुरारी

ज्ञान दिया जीवन का तुमने 

सब को बारी-बारी 

ह्रिदय्-स्थल पर तुम्ही विराजे 

दुनिया वारी वारी

शेषनाग को नाच नचायो 

जैसों कोई मदारी 

मुख में है ब्रह्मांड दिखायो

 जसोदा बलिहारी

 है विनती कर जोड़ तुम्हीं से 

कान्हा किशन मुरारी 

पार लगा देना भवसागर 

जब आए मेरी बारी 

छप्पन भोग है तुम्हें खिलाते 

हंस हंस के नर नारी 

आओ पधारो हमारे अंगना 

गोविंद गिरधारी

राधिका भंडारी©

युवावस्था - एक तपस्या

 युवावस्था - एक् तपस्या

जीवन में इक रसधार लिए 

तुम‌ नित सपने बुनते जाना 

संघर्षों को पतवार बना 

तुम नैया को खेते जाना।

है पथिक कई जीवन पथ पर 

पर तुम्हें समझकर बढ़ना है 

हर राह को निरख परख कर ही

गंतव्य मार्ग से जुड़ना है।

शूल मिलेंगे और पुष्प भी 

जीवन मिश्रित भावों का कुंज

ध्येय सुनिश्चित जो कर लेते 

राह बनता स्वयं ज्योतिपुंज।

पीड़ाओं को परे हटा कर 

अब तुम गर्जित ललकार करो

दीप्तिमान बन अखंड अटल तुम 

यौवन की जय जय कार करो।

तुम से ही है नींव राष्ट्र की 

स्वशक्ति का मनन करो 

विश्व विजयि बनोगे तुम ही 

कर्तव्यनिष्ठ वन सृजन करो।

©राधिका भंडारी

मातृभूमि

 सैंतालिस के तुमुलनाद ने 

गर्वित किया था जन-जन को 

बिगुल बजे थे बजे नगाड़े 

हर्ष हुआ था सब मन को 


आजादी का स्वप्न सुनहरा 

अब जाकर संपूर्ण हुआ 

दिया था हंसते-हंसते जीवन 

वह बलिदां अब पूर्ण हुआ 


यूं ही नही मिली स्वभूमि 

कण कण का रंग लाल हुआ 

वीरों के अनगिनत प्रयास से 

चमक सिंदूरी भाल हुआ 


फिर प्रण किया था  मिल कर सबने

अब ना होंगे कभी विभाजित

दुश्मन आएगा जो , डटकर 

कर देंगे हम उसे पराजित 


यह धरती है माता सबकी 

इसका हम सम्मान धरें

जांत पांत का भेद भुलाकर 

मानवता का मान करें 


है दिवस यह हिंद धरोहर 

हरदम रखना इसका ध्यान 

नैतिकता का पतन हुआ जो 

आंच में आएगा सम्मान 


उठो देश के वीर जवानों 

रग रग में लोहा भर लो 

मातृभूमि के शान की रक्षा 

का अब तुम सब प्रण कर लो

राधिका©

क्या कोई भुला पाता जाने वाले को

 लोग आते हैं 

समय चलता जाता है 

जीवन की राह में 

प्यार बढ़ता जाता है 

और क्षण भंगुर जीवन में

 जो चला जाए कोई 

तो यकीन मानिए 

बहुत याद आता है 

स्मृति के पटल पर पर्दा 

खुल जाता है 

जो था अपने संग 

वह फिर  उस पर दिख जाता है 

पल भर को आंखें नम 

और चेहरे पर हंसी आती है

क्योंकि उसके साथ बिताया 

हर क्षण समक्ष हो जाता है 

यादें और समय का 

बड़ा अटूट नाता है 

मिश्री से घुली यादों की बर्फ 

समय ही जमाता है

 पीछे देखे तो सारी कहानी 

चलचित्र सी लगे 

वह जो चला गया 

सच कहती हूं बहुत याद आता है 

मैं नहीं कहती की यादों में इंसान 

हर पल आंसू बहाता है 

क्योंकि जीवन चलने के सच से ही 

अवगत कराता है 

पर जरा टटोलकर देखिए दिल मेरे दोस्तों 

क्या कोई जाने वाले को पूर्णतया भुला पाता है 

पूर्णतया भुला पाता है

एक छोटी सी गौरैया

 एक छोटी सी गौरैया 

मुझको रोज सताती है 

मेरे चेहरे की पहली मुस्कान बन 

जब वह मेरे आंगन में आती है 

दाना चुग कर चू चू करके 

फिर् वह थोड़ा इठलाती है 


फिर करके फुर्र् फुर्र् वो उड़ती 

दाना लेकर जाती है 

रोज सवेरे मुझसे उसका 

क्या रिश्ता हो जाता है 

दाना ना रखा हो तो क्यों

 उसका मुंह बन जाता है

फुदक फुदक के इधर-उधर वह बलखाती शर्माती है 

दाना रख दूं तो चुग् कर के सर्र्  सर्र् उड़ जाती है 


मेरा उससे क्या रिश्ता है यह मुझको मालूम नहीं 

पर उसके आने की चाहत 

मेरे मन को बहलाती है 

एक छोटी सी गौरैया मुझको रोज हंसाती है

कोरोना काल

 कोरोना काल


कैसी विचित्र है स्थिति ये आई

जीवन का सत्य समक्ष ले आई

प्रत्येक कण कण में व्याप्त हो गया भय

 जिजिविषा जीवित करते है आई


परिस्थितियाँ जो थी कभी अनुकूल

 विपरीत हो भयभीत करने लगी 

मन कभी अस्थिर, तो कभी स्थिर

 सुषुप्तावस्था लुप्त हो जगने लगी


मानवता ने देखे रुप इंसानों के अनेक

कही शर्मसार लोभ लोलुपता के दानव से 

कहीं दैवीय रूप में प्रगटे मनुष्य नेक

 फिर भी कुछ ऐसा ना हुआ जो कोरोना दे घुटने टेक


प्रकृति का यह विचित्र रुप संशोधन के हेतु आया 

'निराली और विचित्र है जगत शक्ति की माया 

 सभ्यता स्थापित हो पुनः, यह जन जन को सिखलाया

अन्यथा जीवनी शक्ति की लुप्त हो जायेगी छाया 

प्राकृत्य ने है ऐसा खेल रचाया


राधिका भंडारी

कभी रात को शबनम बरसते देखा है

 Late night musings


कभी रात को शबनम बरसते

 देखा है तुमने !! 

ऐसा लगता है जैसे अंधेरे में 

आंखें नम हो बरस गई... 

एक भीगी सी चादर 

जैसे तन से लिपट गई हो.. 

रूह को गम की तपिश से 

जुदा करने को !! 

कई ख्वाब..जो दिन में बने थे .. 

कुछ छूटे, कुछ टूटे 

और हकीकत बन.. कुछ सच हो गए

 उन्हीं टूटे सपनों को .. 

आसमान में सितारा बनते 

देखती हूं ... 

जिन्हें पाना चाहती ... पर.. 

पा नहीं सकती .. 

छूना चाहती .. पर.. 

छू नहीं सकती .. 

सिर्फ मुस्कुरा सकती हूं .. 

उनको अपना समझकर !! 

मेरे खयालों की चादर में .. 

ना जाने कितने ऐसे सितारे हैं .. 

जो टिमटिमाए .. 

और सूरज भी बन गए.. 

 और कुछ दूर कहीं .. 

ओझल भी हो गए .. 

उन्हीं अनेकों सूरज में से .. 

एक तुम हो..जिसे मैंने .. 

संभाला है धड़कन की तरह.. 

कि तुम हो ...तो मैं हूं 

तुम नहीं ...तो मैं कहां 

राधिका भंडारी ©

मुझे भी पंख दो कभी तो

 🌹"मुझे भी पंख दो कभी तो 

बाबुल के आंगन से  

लजाई सिमटी सी 

आई मैं तुम्हारा घर सजाने... 

सपनों को पूरा करने की ..आसमानों में उड़ान भरने की ...इजाजत दो कभी तो.. 

मुझे भी पंख दो कभी तो...


मेरे मन की भी इच्छा है 

हंसने की उछलने की 

बालपन को पूर्ण चखने की ... 

इन नैनो में स्वप्न के इंद्रधनुष भरने की..असीम चाहत दो कभी तो ...

मुझे भी पंख दो कभी तो...


प्रेम के संबंध में 

चाहत के आकाश तले

जल क्रीड़ा सा गहन अनुभव दो...

बंधन ना हो कोई ..पर हो बंधा सा.. ऐसा अपना समर्पण दो कभी तो ...

मुझे भी पंख दो कभी तो .....


ठहर गए जो आंसू 

थम-थम के 

दरिया से बन चले जो ... 

उन्हें अपने हाथों की सीपी के हुनर से...मोती कर दो कभी तो ...

मुझे भी पंख दो कभी तो...


बदन है आत्मा है 

चिर परिचित परमात्मा है 

उस में विलीन होने से पहले ... 

जीवन को सार्थक कर ...पूर्ण काया कर दो कभी तो ..

मुझे भी पंख दो कभी तो ..

मुझे भी पंख दो कभी तो ...

राधिका भंडारी

मां सरस्वती

मां सरस्वती

विद्या की देवी है तू ही

तू ही है वरदायिनी,

हम बच्चों को विद्या देती

है मां वीणा वादिनी,

तेरे ही आशीष से हम सब

पाते हैं विद्या अपार

वरदान तेरा मिलता है जब

होता सब का है बेड़ा पार,

ज्ञान भरे हम सब में मां

तेरी माया है अपरमपार,

वीणा का जो तार बजा दे

हो जाता, सबका उद्धार,

शब्दों की संरचना से है

करते हम मााँ नमन तुझे,

दीप ज्ञान का जला मााँ ऐसा

अमर रहे, ना कभी बुझे,

करती है राधिका वंदना

रखना तू लेखनी का ध्यान,

वरद हस्त मााँ रखकर सर पर

देना तू मुझे अभय वरदान,

मेरी है अभिलाषा इतनी

ज्ञान का सूरज उदित रहे,

सरल बने और सजग बने हम

सत्य असत्य क्या, विदित  रहे।

— राधिका भंडारी

2020 - A year that was

 2020: A year to remember


The year began with a pomp and show 

And had to continue merrifully though

The life came to a still for all

The virus came to the world with big blow

The death toll rose to the number unknown 

The mightiest of mighty were out of throne 

Everyone just prayed for life to remain

How precisely the power of Lord was shown 

It's high time that we rewired the thoughts

For too much we created the havoc

The life shall perish or elsewise

Let us not wait for another shock

The world suffered and lost the lives

The planet prayed so that God arrives 

They kept sailing in the faith's  boat

With a hope that soon the life once again strives 

A lesson that we now should learn 

As the universe proclaimed that it can become stern 

If not we listen to the nature's voice 

The planet will be just left to burn ... 

....just left to burn...

Radhika Bhandari©