Saturday, 2 August 2014

बार बार

मैं चली जाती दूर ,,, बहुत दूर
   गर तुम बुरे होते
मैं आस का दीपक बुझाती
     गर तुम बुरे होते
मैं नैनों की टकटकी लगाये
  तुम्हारी बाट न जोहती
    गर तुम बुरे होते
मैं अश्रु की धारा न बहाती
     गर तुम बुरे होते
मैं तड़प तड़प के यूँ न बिलखती
     गर तुम बुरे होते,,,,,
. .
. .
तुम इक बार तो याद करो
      मैं प्यार बार बार करुँगी
तुम इक बार तो इज़हार करो
        मै ज़िन्दगी कुर्बा     बार बार करुँगी
तुम कह दो       कि मेरे अपने हो
         मैं तुम पे जान निसार करुँगी
तुम थाम लो हाथ इक बार
      मैं सज़दे तुम्हारे
             बार बार करुँगी। ……… 

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर मनुहार

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  2. आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा. अंतरजाल पर हिंदी समृधि के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सराहनीय है. कृपया अपने ब्लॉग को “ब्लॉगप्रहरी:एग्रीगेटर व हिंदी सोशल नेटवर्क” से जोड़ कर अधिक से अधिक पाठकों तक पहुचाएं. ब्लॉगप्रहरी भारत का सबसे आधुनिक और सम्पूर्ण ब्लॉग मंच है. ब्लॉगप्रहरी ब्लॉग डायरेक्टरी, माइक्रो ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, ब्लॉग रैंकिंग, एग्रीगेटर और ब्लॉग से आमदनी की सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण मंच प्रदान करता है.
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  3. बस एक बार स्वीकार करो ...
    बहुत ही भावपूर्ण शब्द ...

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