Monday, 4 August 2014

सुख और दुःख

सुख और दुःख एक अंदाज़ हैं ; जो आपके दिल को दुखाये वो दुःख और जो ह्रदय को संतुष्टि दे वो सुख।

परन्तु फिर भी हम भागते हैं एक पक्ष के पीछे पीछे और दुसरे पक्ष से  दूर दूर।  क्यों नहीं हम स्वयं को इतना शक्तिशाली बनाते कि इन भावनाओं के  आकलन से दूर रह सकें ; कुछ पाकर - स्वयं को  संतुष्ट कर सकें और दूसरों को कुछ देकर - उनका दुःख दूर  सकें।  मन में इतनी शक्ति तो उत्पन्न करें कि कल्पना को यथार्थ स्वरुप कर सकें। ना हार को दिल में जगह दें न ही दिमाग में … करें कुछ तो प्रेरणा का स्रोत बनें।

 ह्रदय कि अस्थिरता का कारण इन भावनाओं के जाल में फंसना ही तो है।  स्व अगर मजबूत हो तो  पराये और अपने सभी , साथ  के साथ साथ आदर भी देंगे अन्यथा संग तो दूर रहा अनादर ही मिलेगा।  वहीँ से सुख  और दुःख विभाजित हो जाते हैं ,,,स्वयं पर है निर्भर क्या चुनते हैं ,,,,,जैसी स्थिति वैसी चेष्टा ....... कदाचित हमे जीवन को  भरपूर जीने के लिए  प्रेरित कर सके। 

मात्र दूसरों का अनुसरण करना भी श्रेयस्कर नहीं , अपनी काबिलियत पर भरोसा और आत्मा के ऊपर अभिमान के साथ किये गए कार्यों को ही सराहना मिलती है।

जो बातें हमारे मन से जुडी होती हैं, हम उन्हें ही दूसरो के द्वारा  भी , ऐसा किआ जाना अनिवार्य मानने लगते हैं  . ऐसा न होते ही शुरुआत होती है मन में दरार की।   जीवन कोई जंग नहीं जिसे लड़ा जाए ; ये तो वो गुलज़ार वो बगीचा है जिसमे सिर्फ प्रेम के फूल ही खिलने चाहियें।  जितना बाटों उतना कम।  ईश्वर के हुक्म के बिना तो एक पत्ता भी नहीं खड़क सकता फिर हम क्यों नाशुक्रों की तरह अपनी तरह से संसार और जीवन की गति को चलाने को  आतुर रहते.  ???
 

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